UA-107291522-1
NEWSLAMP
Hindi news, हिन्‍दी समाचार, Breaking news, Latest news-NEWSLAMP

जानिए क्‍या है संसदीय लोकतंत्र से विपथगमन

जागरूकता के लिए हर प्रकार के प्रयास निरंतर आवश्यक

लोकतंत्र की सबसे पहली अनिवार्यता है जागरूकता। उस जागरूकता के लिए हर प्रकार के प्रयास निरंतर आवश्यक होते हैं। जितनी मात्र में जागरूकता बढ़ती है उतनी मात्र में समस्याओं के समाधान के रास्ते अधिक स्पष्ट और निखरते हैं। जनभागीदारी लोकतंत्र को सहज बनाती है। जनभागीदारी का तत्व जितना बढ़ता है लोकतंत्र की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होती है। हमारे देश में कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन लोकतंत्र का एक सीमित अर्थ रहा है चुनाव।

अगले पांच साल के लिए किसको सत्ता का कांट्रैक्ट देना है और जो हमारी समस्या के समाधान में असफल रहा उसे हटा दिया। जब लोकतंत्र सरकार के चयन तक सीमित हो जाता हो तो वह लोकतंत्र पंगु हो जाता है। लोकतंत्र सामथ्र्यवान तब बनता है जब जनभागीदारी बढ़ती है। इसलिए जनभागीदारी को हम जितना बढ़ाएंगे उतना ही लोकतंत्र मजबूत होगा। इसके अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। अगर हम हमारे देश के आजादी के आंदोलन की ओर देखें तो देश में आजादी के लिए मरने वाले लोगों की कमी नहीं थी। कोई दशक ऐसा नहीं गया जब देश पर मरने वालों ने इतिहास न बनाया हो। होता क्या था कि वो आते थे, उनका जज्बा था, मर-मिट जाते थे। फिर कुछ साल बाद रिक्तता आ जाती थी, फिर कोई पैदा होता था, फिर शहादत हो जाती थी। गांधीजी ने आजादी की इस ललक को जनआंदोलन में परिवर्तित कर दिया।

उन्होंने सामान्य मानविकी को आजादी के आंदोलन का सिपाही बना दिया। आज का बहुत बड़ा मैनेजमेंट एक्सपर्ट होगा या आंदोलन शास्त्र को जानता होगा तो वह भी नहीं समझ पाएगा कि मुट्ठी भर नमक उठाना सल्तनत को नीचे लाने का कारण बन सकता है। यह हुआ, क्योंकि आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बना दिया गया। आजादी के बाद अगर देश ने अपनी विकास यात्र में गांधी से प्रेरणा ली होती, जनभागीदारी वाली विकास यात्र को तवज्जो दी होती तो आज जो स्थिति बन गई है कि सब कुछ सरकार करेगी वह न बनती। गांधीजी का मॉडल था कि सब कुछ जनता करेगी। आजादी के बाद जनभागीदारी से अगर विकास यात्र को मॉडल बनाया गया होता तो हम शायद सरकार के भरोसे न रहते। इसलिए समय की मांग है कि हम भारत की विकास यात्र को एक जनआंदोलन बनाएं। समाज के हर व्यक्ति को लगना चाहिए कि मैं देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार हूं। हम पर अपने कार्य को, राष्ट्र को आगे ले जाने का दायित्व है।

इन दिनों स्वच्छ भारत पर काम हो रहा है। हम इसे जनआंदोलन का रूप दे रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इसको छूने का मतलब संकट मोल लेना है। काम करने के बाद खबर छप सकती है कि मोदी बातें बहुत करता है, लेकिन देखो कितनी गंदगी है। लेकिन क्या इस देश में माहौल बनाने की आवश्यकता नहीं है? ईमानदारी से समाज की चेतना को जगाया जाए तो असर दिखता है। 1गैस सब्सिडी की बात है। छोड़ना बहुत मुश्किल काम है। आज मैं बड़े संतोष से कह रहा हूं कि 52 लाख लोगों ने गैस सब्सिडी सरेंडर कर दी है। यह जन मन कैसे बदल रहा है, उसका एक उदाहरण है। सरकार ने भी कहा कि आप जो छोड़ रहे है हम यह पैसा उसे देंगे जिसके घर में लकड़ी से चूल्हा जल रहा है। अब तक 46 लाख लोगों को नए कनेक्शन दिए। हम अंग्रेजों के जमाने के कानून की बात करते हैं। तब हम गुलाम थे। उस समय जो कानून बने वो जनता के प्रति अविश्वास को मुख्य मानकर बनाए गए। क्या आजादी के बाद हमारे कानूनों को नहीं बदला जाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि हम जनता पर भरोसा न करें। जो इस व्यवस्था में आ गए वे तो ईमानदार हैं, जो बाहर हैं वे याचक हैं। यह खाई लोकतंत्र में मंजूर नहीं हो सकती। मैं छोटा से उदाहरण देता हूं। सर्टिफिकेट होते थे तो आपको क्या करना होता था। किसी गजटेड अफसर के पास जाकर उन्हें सत्यापित कराना होता था। वह भी समय के अभाव में बस ठप्पे मार देता है। मैंने कहा कि इसकी जरूरत नहीं।

जेराक्स का जमाना है। जब जरूरत होगी तब जांच करेंगे। हमारी सोच है जनसामान्य पर विश्वास करो। अगर हम विश्वास करेंगे तो सच्चे अर्थो में लोकतंत्र को शक्ति देंगे। 1हमारे सामने लोकतंत्र के लिए दो खतरे भी हैं। एक खतरा मनतंत्र है और दूसरा खतरा मनीतंत्र है। मनतंत्र से देश नहीं चलता है। आपके मन में कोई भी विचार हो, लेकिन इससे व्यवस्था नहीं बदलेगी। मेरे मन में कुछ भी हो, लेकिन हमें आम व्यवस्था से उसे जोड़ना होता है। अपने आपको डाइल्यूट करना होता है। जनता से जुड़ना होता है। दूसरी चिंता का विषय मनीतंत्र है। भारत जैसे गरीब देश में मनीतंत्र लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। मनीतंत्र से लोकतंत्र को कैसे बचाएं, उस पर हमारा बल होगा। हम देखते हैं कि पत्रकारिता हमारे देश में मिशन मोड पर चलती रही है। एक कालखंड था जब समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए मिशन मोड पर पत्रकारिता की गई। दूसरा कालखंड आया जब देश को आजादी दिलाने के लिए यह काम किया गया। तीसरा काम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का था। मेरे कहने का तात्पर्य है यह कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली चीज है। इसमें जो भी योगदान दिया जा रहा है वह राष्ट्र के लिए है। मैं कभी-कभी कहता हूं कि मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस।

हमारे देश में एक कालखंड ऐसा था कि सरकारों को इस बात का गर्व होता था क हमने कितने कानून बनाए। मैंने दूसरी दिशा में सोचा। मेरा इरादा है कि जब पांच साल मेरा कार्यकाल पूरा होगा तब तक मैं क्या रोज एक कानून खत्म कर सकता हूं? आर्थिक विकास में दो क्षेत्रों की चीजों की चर्चा हमेशा चली है। एक प्राइवेट सेक्टर और दूसरा पब्लिक सेक्टर। मैंने एक विषय और जोड़ा है पर्सनल सेक्टर। यह जो पर्सनल सेक्टर है वह अपने आप में बहुत बड़ी ताकत है। अर्थव्यवस्था को छोटे-छोटे लोग चलाते हैं। अगर हमें विकास को जनआंदोलन बनाना है तो प्राइवेट-पब्लिक सेक्टर की सीमा में रहना खत्म करना होगा। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते हैं कि पर्सनल सेक्टर को मजबूत करें। कानूनी रूप से उसकी मदद करें। अगर उन्हें थोड़ा बल दिया जाए, आधुनिक करने का प्रयास किया जाए तो हम उनकी ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए हमने एक योजना बनाई है प्रधानमंत्री मुद्रा योजना। इसके लिए कोई गारंटी की जरूरत नहीं। अभी तक करीब-करीब 42 हजार करोड़ का लोन दे चुके हैं। 1इस बार पार्लियामेंट न चलने से एक ऐसा कानून लटका हुआ है, आपको भी अजीब लगेगा। हम एक कानून लाए था। गरीब व्यक्ति जो नौकरी करता है उसको बोनस अभी सात हजार रुपये तक मिलता है और बोनस 3500 मिलता है। मिनिमम को 21 हजार कर दिया। जिसे 3500 रुपये बोनस मिलता है उसे सात हजार कर दिया। लेकिन आज दुख से कहना पड़ रह है कि संसद न चलने के कारण गरीबों को उनका हक नहीं मिल रहा है। इसीलिए हम अनुरोध कर रहे हैं कि संसद चलने दिया जाए। बात केवल जीएसटी और पार्लियामेंट की हो रही है। अरे जीएसटी का जो होगा सो होगा, लेकिन गरीबों का क्या होगा। आम आदमी का क्या होगा। चर्चा, वाद विवाद, संवाद के लिए संसद से बड़ा मंच नहीं हो सकता। लेकिन अगर हम इस संस्था का सम्मान नहीं करेंगे तो लोकतंत्र पर ही प्रश्नचिन्ह लगेगा। 1(जागरण फोरम में दिए गए वक्तव्य का संपादित
लोकतंत्र की सबसे पहली अनिवार्यता है जागरूकता। उस जागरूकता के लिए हर प्रकार के प्रयास निरंतर आवश्यक होते हैं। जितनी मात्र में जागरूकता बढ़ती है उतनी मात्र में समस्याओं के समाधान के रास्ते अधिक स्पष्ट और निखरते हैं। जनभागीदारी लोकतंत्र को सहज बनाती है। जनभागीदारी का तत्व जितना बढ़ता है लोकतंत्र की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होती है। हमारे देश में कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन लोकतंत्र का एक सीमित अर्थ रहा है चुनाव। अगले पांच साल के लिए किसको सत्ता का कांट्रैक्ट देना है और जो हमारी समस्या के समाधान में असफल रहा उसे हटा दिया। जब लोकतंत्र सरकार के चयन तक सीमित हो जाता हो तो वह लोकतंत्र पंगु हो जाता है।

लोकतंत्र सामथ्र्यवान तब बनता है जब जनभागीदारी बढ़ती है। इसलिए जनभागीदारी को हम जितना बढ़ाएंगे उतना ही लोकतंत्र मजबूत होगा। इसके अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। अगर हम हमारे देश के आजादी के आंदोलन की ओर देखें तो देश में आजादी के लिए मरने वाले लोगों की कमी नहीं थी। कोई दशक ऐसा नहीं गया जब देश पर मरने वालों ने इतिहास न बनाया हो। होता क्या था कि वो आते थे, उनका जज्बा था, मर-मिट जाते थे। फिर कुछ साल बाद रिक्तता आ जाती थी, फिर कोई पैदा होता था, फिर शहादत हो जाती थी। गांधीजी ने आजादी की इस ललक को जनआंदोलन में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने सामान्य मानविकी को आजादी के आंदोलन का सिपाही बना दिया। 1आज का बहुत बड़ा मैनेजमेंट एक्सपर्ट होगा या आंदोलन शास्त्र को जानता होगा तो वह भी नहीं समझ पाएगा कि मुट्ठी भर नमक उठाना सल्तनत को नीचे लाने का कारण बन सकता है। यह हुआ, क्योंकि आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बना दिया गया। आजादी के बाद अगर देश ने अपनी विकास यात्र में गांधी से प्रेरणा ली होती, जनभागीदारी वाली विकास यात्र को तवज्जो दी होती तो आज जो स्थिति बन गई है कि सब कुछ सरकार करेगी वह न बनती। गांधीजी का मॉडल था कि सब कुछ जनता करेगी। आजादी के बाद जनभागीदारी से अगर विकास यात्र को मॉडल बनाया गया होता तो हम शायद सरकार के भरोसे न रहते। इसलिए समय की मांग है कि हम भारत की विकास यात्र को एक जनआंदोलन बनाएं। समाज के हर व्यक्ति को लगना चाहिए कि मैं देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार हूं। हम पर अपने कार्य को, राष्ट्र को आगे ले जाने का दायित्व है। इन दिनों स्वच्छ भारत पर काम हो रहा है। हम इसे जनआंदोलन का रूप दे रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इसको छूने का मतलब संकट मोल लेना है। काम करने के बाद खबर छप सकती है कि मोदी बातें बहुत करता है, लेकिन देखो कितनी गंदगी है। लेकिन क्या इस देश में माहौल बनाने की आवश्यकता नहीं है? ईमानदारी से समाज की चेतना को जगाया जाए तो असर दिखता है। गैस सब्सिडी की बात है। छोड़ना बहुत मुश्किल काम है।

आज मैं बड़े संतोष से कह रहा हूं कि 52 लाख लोगों ने गैस सब्सिडी सरेंडर कर दी है। यह जन मन कैसे बदल रहा है, उसका एक उदाहरण है। सरकार ने भी कहा कि आप जो छोड़ रहे है हम यह पैसा उसे देंगे जिसके घर में लकड़ी से चूल्हा जल रहा है। अब तक 46 लाख लोगों को नए कनेक्शन दिए। हम अंग्रेजों के जमाने के कानून की बात करते हैं। तब हम गुलाम थे। उस समय जो कानून बने वो जनता के प्रति अविश्वास को मुख्य मानकर बनाए गए। क्या आजादी के बाद हमारे कानूनों को नहीं बदला जाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि हम जनता पर भरोसा न करें। जो इस व्यवस्था में आ गए वे तो ईमानदार हैं, जो बाहर हैं वे याचक हैं। यह खाई लोकतंत्र में मंजूर नहीं हो सकती। मैं छोटा से उदाहरण देता हूं। सर्टिफिकेट होते थे तो आपको क्या करना होता था। किसी गजटेड अफसर के पास जाकर उन्हें सत्यापित कराना होता था। वह भी समय के अभाव में बस ठप्पे मार देता है। मैंने कहा कि इसकी जरूरत नहीं। जेराक्स का जमाना है। जब जरूरत होगी तब जांच करेंगे। हमारी सोच है जनसामान्य पर विश्वास करो। अगर हम विश्वास करेंगे तो सच्चे अर्थो में लोकतंत्र को शक्ति देंगे। हमारे सामने लोकतंत्र के लिए दो खतरे भी हैं। एक खतरा मनतंत्र है और दूसरा खतरा मनीतंत्र है। मनतंत्र से देश नहीं चलता है। आपके मन में कोई भी विचार हो, लेकिन इससे व्यवस्था नहीं बदलेगी। मेरे मन में कुछ भी हो, लेकिन हमें आम व्यवस्था से उसे जोड़ना होता है। अपने आपको डाइल्यूट करना होता है। जनता से जुड़ना होता है। दूसरी चिंता का विषय मनीतंत्र है। भारत जैसे गरीब देश में मनीतंत्र लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। मनीतंत्र से लोकतंत्र को कैसे बचाएं, उस पर हमारा बल होगा। हम देखते हैं कि पत्रकारिता हमारे देश में मिशन मोड पर चलती रही है। एक कालखंड था जब समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए मिशन मोड पर पत्रकारिता की गई। दूसरा कालखंड आया जब देश को आजादी दिलाने के लिए यह काम किया गया। तीसरा काम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का था। मेरे कहने का तात्पर्य है यह कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली चीज है। इसमें जो भी योगदान दिया जा रहा है वह राष्ट्र के लिए है। मैं कभी-कभी कहता हूं कि मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस।

हमारे देश में एक कालखंड ऐसा था कि सरकारों को इस बात का गर्व होता था क हमने कितने कानून बनाए। मैंने दूसरी दिशा में सोचा। मेरा इरादा है कि जब पांच साल मेरा कार्यकाल पूरा होगा तब तक मैं क्या रोज एक कानून खत्म कर सकता हूं? आर्थिक विकास में दो क्षेत्रों की चीजों की चर्चा हमेशा चली है। एक प्राइवेट सेक्टर और दूसरा पब्लिक सेक्टर। मैंने एक विषय और जोड़ा है पर्सनल सेक्टर। यह जो पर्सनल सेक्टर है वह अपने आप में बहुत बड़ी ताकत है। अर्थव्यवस्था को छोटे-छोटे लोग चलाते हैं। अगर हमें विकास को जनआंदोलन बनाना है तो प्राइवेट-पब्लिक सेक्टर की सीमा में रहना खत्म करना होगा। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते हैं कि पर्सनल सेक्टर को मजबूत करें। कानूनी रूप से उसकी मदद करें। अगर उन्हें थोड़ा बल दिया जाए, आधुनिक करने का प्रयास किया जाए तो हम उनकी ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए हमने एक योजना बनाई है प्रधानमंत्री मुद्रा योजना। इसके लिए कोई गारंटी की जरूरत नहीं। अभी तक करीब-करीब 42 हजार करोड़ का लोन दे चुके हैं। 1इस बार पार्लियामेंट न चलने से एक ऐसा कानून लटका हुआ है, आपको भी अजीब लगेगा। हम एक कानून लाए था। गरीब व्यक्ति जो नौकरी करता है उसको बोनस अभी सात हजार रुपये तक मिलता है और बोनस 3500 मिलता है। मिनिमम को 21 हजार कर दिया। जिसे 3500 रुपये बोनस मिलता है उसे सात हजार कर दिया। लेकिन आज दुख से कहना पड़ रह है कि संसद न चलने के कारण गरीबों को उनका हक नहीं मिल रहा है। इसीलिए हम अनुरोध कर रहे हैं कि संसद चलने दिया जाए। बात केवल जीएसटी और पार्लियामेंट की हो रही है। अरे जीएसटी का जो होगा सो होगा, लेकिन गरीबों का क्या होगा। आम आदमी का क्या होगा। चर्चा, वाद विवाद, संवाद के लिए संसद से बड़ा मंच नहीं हो सकता। लेकिन अगर हम इस संस्था का सम्मान नहीं करेंगे तो लोकतंत्र पर ही प्रश्नचिन्ह लगेगा।

कृपया पाठक अपनी पसंद के अनुसार समाचार को स्‍टार रेटिंग दें।
80%
Awesome
  • Design
  • News
  • Content

उत्तर छोड़ दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा।

अपनी राय देने के लिए धन्यवाद।

Subscribe to our newsletter
Sign up here to get the latest news, updates and special offers delivered directly to your inbox.
You can unsubscribe at any time

आपके खबरें पढ़ने के अनुभव बेहतर बनाने के लिए यह वेबसाइट कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करती है। जिससे आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत हैं। स्वीकार आगे पढ़ें